समाजशास्त्र क्या है: अर्थ, परिभाषा, प्रकृति, महत्व एवं विशेषताएं (What is Sociology in Hindi)| Samajshastra kya hai

समाजशास्त्र क्या है - आज हम आपको समाजशास्त्र के बारे में बताने वाले हैं। समाजशास्त्र को कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। तो आज हम यह जानेंगे कि Samajshastra kya hai ? समाजशास्त्र की परिभाषा क्या है ? समाजशास्त्र शब्द का अर्थ क्या होता है और इसकी उत्पत्ति कैसे हुई ? (Meaning and Definition of Sociology in Hindi) इसके अलावा समाजशास्त्र की प्रकृति, विशेषताएं एवं महत्व के बारे में भी आपको जानकारी मिलेगी।

समाजशास्त्र क्या है: अर्थ, परिभाषा, प्रकृति, महत्व एवं विशेषताएं (What is Sociology in Hindi)

समाजशास्त्र का अर्थ (Meaning of Sociology)

समाजशास्त्र को अंग्रेजी में Sociology कहा जाता है। Sociology शब्द Socius और logos दो शब्दों से मिलकर बना है। Socius लैटिन भाषा का एक शब्द हैं जिसका अर्थ होता है - समाजLogos एक ग्रीक शब्द है जिसका अर्थ होता है - विज्ञान या अध्ययन। इसप्रकार समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ होता है - समाज का विज्ञान या समाज का अध्ययन।

समाज का अर्थ सामाजिक सम्बन्धों के ताने-बाने से है जबकि विज्ञान किसी भी विषय के व्यवस्थित एवं क्रमवद्ध ज्ञान को कहते है।

समाजशास्त्र को एक नवीन विज्ञान के रूप में स्थापित करने का श्रेय फ्रांस के प्रसिद्ध विद्वान आगस्त कॉम्टे (Auguste Comte) को जाता है। कॉम्टे ने ही 1838 में इस नए विषय को Sociology नाम दिया था। इसलिए आगस्त कॉम्टे को समाजशास्त्र का जनक (Father of Sociology) कहा जाता है।

आगस्त कॉम्टे को सिर्फ इसलिए Samajshastra का जनक नहीं कहा जाता है क्योंकि उन्होंने समाजशास्त्र नाम दिया बल्कि समाजशास्त्र को एक विषय के रूप में स्थापित करने में उनके अहम योगदान के कारण उन्हें समाजशास्त्र का जनक कहा जाता है।

चूँकि Sociology दो भाषाओं के शब्दों से मिलकर बना है इसलिए जॉन स्टुअर्ट मिल ने समाजशास्त्र को दो भाषाओं की अवैध संतान कहा एवं इसके स्थान पर इथोलॉजी (Ethology) शब्द प्रयोग करने का सुझाव दिया था जिसे अधिकांश विद्वानों ने अस्वीकार कर दिया।

समाजशास्त्र की परिभाषा (Definition of Sociology)

समाजशास्त्र की कोई सर्वमान्य परिभाषा नही है। विभिन्न विद्वानों ने इसकी परिभाषा भिन्‍न-भिन दृष्टिकोणों से दी है। विभिन्न विद्वानों ने समाजशास्त्र को एक समाज-वैज्ञानिक विषय व सामाजिक विषय के रूप में अपने-अपने तरीकों से परिभाषित करने के प्रयास किए।

आगस्त काॅम्टे के अनुसार"समाजशास्त्र सामाजिक व्यवस्था और प्रगति का विज्ञान है।"

समाजशास्त्रियों द्वारा दी गई परिभाषाओं को हम निम्नलिखित पांच प्रमुख श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं -

1. समाजशास्त्र समाज का अध्ययन है

अधिकांश विद्वान (जैसे - ओडम, वार्ड, जिसबर्ट, गिडिंग्स आदि) समाजशास्त्र को समाज के अध्ययन या समाज के विज्ञान के रूप में परिभाषित करते है।

लिस्टर एफ. वार्ड (Lester F. Ward) के अनुसार - "समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है।"

ओडम (Odum) के अनुसार - "समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो समाज का अध्ययन करता है।"

एफ. एच. गिडिंस (Giddings) के अनुसार - "समाजशास्त्र समग्र रूप से समाज का क्रमवद्ध वर्णन तथा व्याख्या है।"

जिसबर्ट (Gisbert) के अनुसार - "समाजशास्त्र सामान्यतः समाज के विज्ञान के रूप में परिभाषित किया जाता है।"

2. समाजशास्त्र सामाजिक संबंधो का अध्ययन है

कुछ विद्वानों (जैसे - मैकाइवर एवं पेज, क्यूबर, रोज, सिमेल, ग्रीन आदि) ने समाजशास्त्र को सामाजिक सम्बन्धों के क्रमबद्ध अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है।

मैकाइवर एवं पेज (Maciver and Page) के अनुसार - "समाजशास्त्र सामाजिक सम्बन्धों के विषय में है। सम्बन्धों के इस जाल को हम 'समाज' कहते हैं।"

क्यूबर (Cuber) के अनुसार - "समाजशास्त्र को मानव सम्बन्धों के वैज्ञानिक ज्ञान के ढाँचे के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।"

रोज (Rose) के अनुसार - "समाजशास्त्र मानव सम्बन्धों का विज्ञान है।"

सिमेल (Simmel) के अनुसार - "समाजशास्त्र मानवीय अन्तर्सम्बन्धों के स्वरूपों का विज्ञान है।"

3. समाजशास्त्र सामाजिक जीवन, घटनाओं, व्यवहार एवं कार्यों का अध्ययन है

कुछ विद्वानों (जैसे - ऑगबर्न एवं निमकॉफ, बेनेट एवं ट्यूमिन, किम्बल यंग, सोरोकिन आदि) ने समाजशास्त्र को सामाजिक जीवन, व्यक्तियों के व्यवहार एवं उनके कार्यों तथा सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया है।

ऑगबर्न एवं निमकॉफ (Ogburn and Nimkoff) के अनुसार - "समाजशास्त्र सामाजिक जीवन का वैज्ञानिक अध्ययन है।"

बेनेट एवं ट्यूमिन  (Beanet and Tumin) के अनुसार - "समाजशास्त्र सामाजिक जीवन के ढाँचे और कार्यों का विज्ञान है।"

यंग (Young) के अनुसार - "समाजशास्त्र समूहों में मनुष्यों के व्यवहार का अध्ययन करता है।"

4. समाजशास्त्र सामाजिक समूहों का अध्ययन है

जॉनसन (Johnson) के अनुसार - "समाजशास्त्र सामाजिक समूहों का विज्ञान है।"

5. समाजशास्त्र अन्तर्क्रियाओं का अध्ययन है

मोरिस गिंसवर्ग के अनुसार - "समाजशास्त्र मानवीय अन्तःक्रियाओं और अन्तःसम्बन्धों, उनकी दशाओं और परिणामों का अध्ययन हैं।"

समाजशास्त्र क्या है - What is Sociology in Hindi

समाजशास्त्र की परिभाषा से हमें पता चलता है कि समाजशास्त्र क्या है। अलग-अलग विद्वानों ने इसे अलग-अलग तरीके से परिभाषित किया है।

आगस्त कॉम्टे का मानना था कि जिस प्रकार भौतिक वस्तुओं का अध्ययन करने के लिए भौतिकशास्त्र, अतीत की घटनाओं का अध्ययन करने के लिए इतिहास, आर्थिक क्रियाओं के अध्ययन के लिए अर्थशास्त्र है। ठीक उसी प्रकार सामाज का अध्ययन करने के लिए एक अलग सामाजिक विज्ञान की आवश्यकता है। शुरुआत में इन्होने इसे सामाजिक भौतिकी (Social Physics) नाम दिया था और 1838 में बदलकर समाजशास्त्र रखा था।

समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है। यह एक ऐसा विषय है जिसमें मानव समाज के विभिन्‍न स्वरूपों, उसकी विविध संरचनाओं, प्रक्रियाओं इत्यादि का वस्तुनिष्ठ एवं क्रमबद्ध रूप से अध्ययन किया जाता है। यह 'राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान एवं मानवशास्त्र की तरह एक सामाजिक विज्ञान है। यह अन्य विषयों की भाँति सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक रूप से परिपक़्व व स्वतंत्र विषय है।

समाजशास्त्र का इतिहास: उत्पत्ति एवं विकास

समाज का विज्ञान होने के नाते इस विषय की उत्पत्ति तभी से मानी जानी चाहिए जब से कि स्वयं समाज का निर्माण हुआ है और मनुष्य ने समाज के विभिन्‍न पहलुओं के बारे में चिन्तन प्रारम्भ किया है। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। इसका इतिहास 200 साल से भी कम पुराना है।

समाजशास्त्र के जन्म के लिए फ्रांसीसी क्रांति व औद्योगिक क्रांति को प्रमुख कारक माना जाता हैं। यूरोप में पुनर्जागरण और वाणिज्यिक क्रांति से समाज में एक नई चेतना का जन्म हुआ।

विभिन्न घटनाओं, आंदोलनों, क्रांतियों के फलस्वरूप यूरोप  में कई सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व आर्थिक परिवर्तन हुए। इन बदलावों के कारण समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने के लिए एक नए विषय की आवश्यकता महसूस हुई।

इसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए समाजशास्त्र का उद्भव हुआ। 1838 में फ्रांस के आगस्त कॉम्टे ने समाजशास्त्र को एक विषय के रूप में स्थापित किया। शुरुआत में उन्होंने इसे सामाजिक भौतिकी (Social Physics) नाम दिया था जिसे बाद में बदलकर Sociology कर दिया।

कालांतर में दुर्खीम, स्पेंसर, मैक्स वेबर एवं कई अन्य विद्वानों ने समाजशास्त्र को एक अकादमिक विषय के रूप में विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिए।

पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में समाजशास्त्र का उद्भव बहुत समय बाद हुआ। जिस समय भारत में समाजशास्त्र का उद्भव हुआ उस वक्त भारत ब्रिटेन का उपनिवेश था। शुरुआत में यहाँ समाजशास्त्र का अध्यययन यूरोपीय विद्वानों द्वारा ही किया गया।

भारत में समाजशास्त्र की वास्तविक शुरुआत बम्बई विश्वविद्यालय से मानी जाती है। यहाँ 1919 में पेट्रिक गेडिस की अध्यक्षता में समाजशास्त्र विभाग की शुरुआत हुई। इसी प्रकार भारत में कई विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र का अध्ययन शुरू हुआ।

एस सी दूबे, एम एन श्रीनिवास, जी एस घुरिए, के एम कपाड़िया, ए के सरन, डी एन मजूमदार, पी एच प्रभु, ए आर देसाई, इरावती कर्वे, राधाकमल मुखर्जी, योगेंद्र सिंह आदि भारत के प्रमुख समाजशास्त्री है।

समाजशास्त्र की विशेषताएं (Characteristics of Sociology)

समाजशास्त्र की परिभाषा और प्रकृति से हमें इसकी विशेषताओं के बारे में पता चलता है। समाजशास्त्र एक स्वतंत्र विज्ञान है जिसकी प्रकृति विज्ञान की तरह पूर्णतः वैज्ञानिक है। समाजशास्त्र की निम्नलिखित विशेषताएँ है -

  • समाजशास्त्र एक सामाजिक विज्ञान है, प्राकृतिक विज्ञान नहीं।
  • समाजशास्त्र एक वास्तविक (निश्चयात्मक) विज्ञान है, आदर्शात्मक विज्ञान नहीं।
  • समाजशास्त्र एक विशुद्ध विज्ञान है, व्यावहारिक विज्ञान नहीं।

समाजशास्त्र का महत्व (Importance of Sociology)

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। यह समाज में रहता है। समाजशास्त्र का अध्ययन व्यक्ति और सामाज दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। समाजशास्त्र के अध्ययन से हमें समाज की संरचना, उसके स्वरुप और प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी मिलती है। इसके अध्ययन से हम समाज की समस्याओं के बारे में जान सकते है। समाजशास्त्र के अंतर्गत समाज के सभी पहलुओं का अध्ययन किया जाता है। इसलिए समाजशास्त्र के अध्ययन का काफी महत्त्व है।

समाजशास्त्र की प्रकृति (Nature of Sociology)

किसी भी विषय की प्रकृति से आशय है कि सम्बद्ध विषय विज्ञान है अथवा कला।

जहाँ तक समाजशास्त्र की प्रकृति का सम्बन्ध है तो समाजशास्त्र के जनक कहे जाने वाले आगस्त कॉम्टे सहित इमाईल दुर्थीम, मैक्स वेबर आदि प्रतिष्ठित समाजशास्त्रियों ने समाजशास्त्र को शुरू से ही विज्ञान माना है।

समाजशास्त्र को विज्ञान मानने के निम्नलिखित कारण है -

1. समाजशास्त्र में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग, वस्तुनिष्ठ अध्ययन, सत्यापनीयता, निश्चितता, कार्य-कारण सम्बन्धों की स्थापना के गुण विद्यमान है। इसलिए इसकी प्रकृति विज्ञान जैसी है।

2. विज्ञान की ही तरह समाजशास्त्र में सामान्यीकरण करना, पूर्वानुमान लगाना, आनुभविक अध्ययन एवं सार्वभौमिकता की दशाएँ सन्निहित रहती हैं जो समाजशास्त्र की प्रकृति वैज्ञानिक बनाती हैं।

विज्ञान की सभी विशेषताएँ होने के बावजूद समाजशास्त्र की कुछ सीमाएँ हैं। इस बात को सावधानी के साथ समझने की आवश्यकता है कि समाजशास्त्र प्राकृतिक विज्ञान न होकर सामाजिक विज्ञान है। ऐसी स्थिति में इसकी अपनी कुछ सीमाएँ है।

प्राकृतिक विज्ञानों की विषय सामग्री विवेकशील नहीं होती है किन्तु समाजशास्त्र की सामग्री विवेकशील होती है। समाजशास्त्र की विषयवस्तु मनुष्य होते है, जो अपने व्यवहार में कभी भी परिवर्तन ला सकते है।

ऐसी स्थिति में समाजशास्त्र के लिए सत्यापनीयता व पूर्वानुमान लगाना प्राकृतिक विज्ञान की तुलना में कठिन होता है।

प्राकृतिक विज्ञान से अंतर होने के बावजूद समाजशास्त्र में समस्याओं के चयन, परिकल्पना का निर्माण, तथ्यों का संकलन, तथ्यों का वर्गीकरण एवं विश्लेषण और सिद्धांत निर्माण में उन्ही पद्धतियों को अपनाया जाता है जो प्राकृतिक विज्ञान में अपनाया जाता है। अतः समाजशास्त्र की प्रकृति विज्ञान जैसी है।

निष्कर्ष

समाजशास्त्र समाज का व्यवस्थित एवं क्रमवद्ध अध्ययन हैं। यह समाज का विज्ञान है। आगस्त कॉम्टे (Auguste Comte) को समाजशास्त्र का जनक कहा जाता है। यूरोप में पुनर्जागरण, औद्योगिक क्रांति एवं फ्रांसीसी क्रांति को एक विषय के रूप में समाजशास्त्र की उत्पत्ति के लिए जिम्मेदार कारक माना जाता हैं।

समाजशास्त्र की कोई सर्वमान्य परिभाषा नही है। विभिन्न विद्वानों ने इसे अपने तरीके से परिभाषित किया है। समाजशास्त्र की प्रकृति विज्ञान जैसी है। इसमें विज्ञान के सभी गुण विद्यमान है तथापि यह प्राकृतिक विज्ञान नही बल्कि सामाजिक विज्ञान है।

आज आपने समाजशास्त्र के बारे में जाना। उम्मीद है अब आप samajshastra kya hai अच्छी तरह से जान गए होंगे। इसके अलावा समाजशास्त्र की परिभाषा और प्रकृति के बारे में भी अच्छी तरह से जान गए होंगे।

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