जाहरवीर गोगा जी महाराज की मृत्यु कैसे हुई थी?

गोगा जी महाराज की मृत्यु कैसे हुई थी?

गोगा जी महाराज को देवता की तरह पूजा जाता हैं। क्या आप जानते है कि गोगा जी की मृत्यु कैसे हुई ? अगर आपके मन में भी यह सवाल उठता हैं और आप इसके बारे में जानना चाहते है तो आज हम आपको यह बताने वाले हैं कि गोगा जी की मृत्यु कैसे हुई थी ? सबसे पहले हम गोगा जी महाराज के बारे  लेते है।

परिचय

गोगा जी राजस्थान के लोक देवता हैं। इन्हें 'जाहरवीर गोगा राणा या जाहरपीर गोगा जी' के नाम से भी जाना जाता है। लोग उन्हें गोगाजी, गुग्गा वीर, जाहिर वीर, राजा मण्डलिक आदि नामों से पुकारते हैं। गुजरात मे रबारी जाति के लोग गोगा जी को गोगा महाराज के नाम से बुलाते है।

गोगा जी के गुरु गोरखनाथ थे। गोगा जी गुरु गोरखनाथ के परम शिष्यों में से एक थे।

गोगा जी का जन्म चौहान वंश में हुआ था। उनका जन्म उस वंश में हुआ था जिस वंश के पृथ्वीराज चौहान थे। चौहान वंश में पृथ्वीराज चौहान के बाद सबसे ज्यादा ख्याति प्राप्त राजा गोगा जी ही है। गोगा जी का राज्य सतलुज से हांसी (हरियाणा) तक था।

गोगा जी का जन्म राजस्थान के ददरेवा में चौहान वंश के शासक जैबर (जेवर सिंह) की पत्नी बाछल देवी के गर्भ से गुरु गोरखनाथ के वरदान से हुआ था।

गोगा जी का जन्म कैसे हुआ?

गोगा जी का जन्म गुरू गोरखनाथ के वरदान से हुआ था। गोगा जी की माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नहीं मिला।

गुरू गोरखनाथ ‘गोगामेडी’ के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गई तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुग्गल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत गोगा जी का जन्म हुआ। गुग्गल फल के नाम से इनका नाम गोगा जी पड़ा।

लोक देवता गोगा जी का जन्म भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को हुआ था। इसे गोगा नवमी से जाना जाता है। राजस्थान के लोग गोगा जी की पूजा बड़े धूमधाम के साथ करते हैं।

गोगा देव का जन्म स्थान राजस्थान के चुरू जिले के दत्तखेड़ा में स्थित है। जहां पर सभी धर्म और सम्प्रदाय के लोग मत्था टेकने के लिए दूर-दूर से आते हैं।

गोगा जी की जन्मभूमि पर आज भी उनके घोड़े का अस्तबल है। सैकड़ों वर्ष बीतने के बाद भी उनके घोड़े की रकाब अभी भी वहीं पर हैं।

गोगा जी महाराज की मृत्यु कैसे हुई?

मान्यता के अनुसार, गोगा जी के दो मौसेरे भाई थे - अर्जन और सुर्जन। गोगा जी का अपने मौसेरे भाइयों अर्जन व सुर्जन के साथ जमीन जायदाद को लेकर झगड़ा था। ऐसा माना जाता है कि अर्जन-सुर्जन ने मुस्लिम आक्रान्ता महमूद गजनवी की मदद से गोगा जी पर आक्रमण कर दिया।

महमूद गजनवी के साथ युद्ध में गोगा जी वीरता पूर्वक सतलज के मार्ग की रक्षा कर रहे थे। इसी युद्ध में गोगा जी अपने बेटों के साथ शहीद हो गए।

माना जाता है युद्ध करते समय गोगा जी का सर ददरेवा (चुरू) में गिरा इसलिए इन्हें शीर्षमेडी (शीषमेडी) तथा धड़ नोहर (हनुमानगढ़) में गिरा इसलिए धरमेडी/धुरमेडी व गोगामेडी भी कहते है।

लोगो का मानना हैं कि बिना सर गोगा जी को युद्ध करते देख कर महमूद गजनवी ने गोगा जी को जाहिर पीर (प्रत्यक्ष पीर) कहा था।

सांपो के देवता के रूप में गोगा जी

लोककथाओं के अनुसार गोगा जी को सांपों के देवता के रूप में पूजा जाता है। लोग उन्हें गोगाजी चौहान, गुग्गा, जाहिर वीर व जाहर पीर के नामों से पुकारते हैं। पौराणिक कथा के मुताबिक, गोगा देवता की पूजा करने से सांपों से रक्षा होती है।

गोगा जी की पत्नी को सांप ने काट लिया। सांप के काटने से केलमदे की मृत्यु हो गई जिससे गोगा जी क्रोधित हो गए और एक अग्नि अनुष्ठान किया। इस अनुष्ठान में कई सांप जल कर भस्म हो गए। इसके बाद सांपो के मुखिया उनके सामने प्रकट हो गए और अनुष्ठान रोकने के आग्रह किया। सांपो के मुखिया ने केलमदे को जीवित किया। इस प्रकार गोगा जी ने सांपो पर विजय प्राप्त किया। तभी से गोगा जी सांपो या नागों के देवता के रूप में पूजे जाते है।

यह पोस्ट विभिन्न स्त्रोतों जैसे लेख, इंटरनेट आर्टिकल्स आदि से प्राप्त जानकारी के आधार पर लिखी गई हैं।

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