
भगत सिंह को फांसी की सजा मुख्य रूप से लाहौर षड्यंत्र केस (Lahore Conspiracy Case) के लिए दी गई थी। इसके पीछे की पूरी कहानी और प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
1. जॉन सॉन्डर्स की हत्या (मुख्य कारण)
1928 में साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां बरसाईं, जिससे कुछ समय बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसका बदला लेने के लिए भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर ने पुलिस अधीक्षक जे.ए. स्कॉट को मारने की योजना बनाई। हालांकि, पहचान की गलती के कारण उन्होंने 17 दिसंबर 1928 को सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन सॉन्डर्स को गोली मार दी। ब्रिटिश सरकार ने इसे अपनी सत्ता को सीधी चुनौती माना।
2. असेंबली में बम फेंकना
8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की 'सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली' में दो बम फेंके। उनका उद्देश्य किसी को मारना नहीं, बल्कि सोती हुई ब्रिटिश सरकार को जगाना और दमनकारी कानूनों (पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल) का विरोध करना था। बम फेंकने के बाद उन्होंने भागने के बजाय खुद को गिरफ्तार करवाया।
3. लाहौर षड्यंत्र केस की सुनवाई
गिरफ्तारी के बाद जब जांच आगे बढ़ी, तो पुलिस ने सॉन्डर्स की हत्या की कड़ियों को इनसे जोड़ दिया। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव पर "ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने" और "हत्या" का मुकदमा चलाया गया।
4. जेल में भूख हड़ताल
जेल में रहने के दौरान भगत सिंह और उनके साथियों ने राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए लंबी भूख हड़ताल की। इससे उनकी लोकप्रियता पूरे देश में बहुत बढ़ गई, जिससे ब्रिटिश सरकार असुरक्षित महसूस करने लगी और उन्होंने मुकदमे की प्रक्रिया को तेज कर दिया।
अंतिम फैसला
7 अक्टूबर 1930 को ट्रिब्यूनल ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा सुनाई। हालांकि फांसी की तारीख 24 मार्च 1931 तय की गई थी, लेकिन बढ़ते जन आक्रोश के डर से उन्हें निर्धारित समय से 11 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 को रात 7:33 बजे लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई।